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दोपहर का भोजन कहानी – अमरकांत समीक्षा, पात्र और सार/सारांश

दोपहर का भोजन ज्ञानालय अमरकांत Gyanalay

पात्र परिचय

 मोहन – साँवला और आँखे छोटी, उसके चेहरे पर चेचक के दाग थे। अपने भाई की ही तरह दुबला-पतला था किंतु लंबा नहीं था। उम्र के हिसाब से वह अधिक गंभीर और पढ़ाई में सदा सराबोर रहने वाला।

दोपहर का भोजन कहानी की समीक्षा

कहानी का सार

खाने में कुल दो रोटियाँ, भरा-कटोरा पनियाई दाल और चने की तली तरकारी।

सिद्धेश्वरी डरते हुए अपने बेटे को देख रही थी।

कुछ देर बाद उसने पुछा कि वहाँ कुछ हुआ क्या ?

रामचंद्र ने कहा “समय आने पर सब ठीक हो जाएगा।”

रामचंद्र ने पुछा प्रमोद खा चुका रोया तो नहीं था ? सिद्धेश्वरी ने उदास भाव से कहा “हाँ, खा चुका।”

सिद्धेश्वरी ने झुठ कहा आज सचमुच नहीं रोया।

प्रमोद कल रेवड़ी के लिए डेढ़ घंटे तक रोया था।

बचे हुए अंतिम टुकड़े को सिद्धेश्वरी के जाने के पश्चात उसे मुँह में इस सरलता से रखता है जैसे कि पान का बीड़ा हो।

सिद्धेश्वरी ने थाल रखते हुए सवाल किया कि कहाँ रह गया था ?

सिद्धेश्वरी को समझ नहीं आया कि क्या करें उसे इन दोनों लड़कों से बहुत डर लगता था।

दो रोटियाँ, कटोरा-भर दाल, चने का तली तरकारी मुंशी जी पीढ़े पर पालथी मारकर बैठे एक-एक ग्रास को इस तरह चुभली-चबा रहे थे, जैसे बुढ़ी गाय जुगाली करती है।

सिद्धेश्वरी ने कहा बड़का की कसम एक रोटी देती हुँ।

फिर उसने एक टक प्रमोद को देखा और रोटी को दो टुकड़ों में विभाजित कर दिया।

इसे भी पढ़े हार की जीत कहानी।

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