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सेवासदन उपन्यास – प्रेमचंद की समीक्षा, पात्र परिचय और सारांश / सार

सेवासदन उपन्यास का प्रकाशन वर्ष 1918 ई है।

यह उपन्यास सर्वप्रथम उर्दू में बाजार-ए-हुस्न के नाम से प्रेमचंद ने सन् 1917 में प्रकाशित करवाया ।

यह हिन्दी का पहला प्रौढ़ उपन्यास है।

नारी-पराधीनता को सेवासदन में बहुत अच्छी तरह चित्रित किया गया है।

प्रेमचंद समझते थे कि नारी-शोषण स्वर्ण समाज में ज़्यादा है, क्योंकि वहाँ नारी आर्थिक दृष्टि से पुरूष पर आश्रित होती है।

सेवासदन की सुमन भारतीय कथा साहित्य की पहली नारी पात्र है, जो यह बात समझती है और इसके विरुद्ध विद्रोह करती है।

यह उपन्यास दहेज की विकृति में फंसी भारतीय नारी की स्थिति को ब्याँ करता है।

जहॉं स्त्री के पतित हो जाने पर और अपनी इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए उसे न चाहते हुए भी वैश्या बनने को मजबूर होना पड़ता है।

भारतीय नारी की विवशता और नारी की भावनाओं का मार्मिक चित्रण इस उपन्यास में मिलता है।

उपन्यास के पात्र

सुमन या सुमन बाई – मुख्य पात्र

कृष्णचंद – सुमन के पिता, पेशे से दरोगा

गंगाजली – सुमन की मॉं

उमानाध – सुमन के मामा

शांता – सुमन की छोटी बहन

गजाधर पांडे (गजानंद) – सुमन का पति

पंडित पदमसिंह (शर्मा जी )- पेशे से वकील, समाजसेवी

सुभद्रा – पंडित पदमसिंह की पत्नी

मदन सिंह – पदमसिंह के बड़े भाई

भामा – मदन सिंह की पत्नी

सदन सिंह  –  मदन सिंह का बेटा

विट्ठलदास –  पदमसिंह के परम मित्र, समाजसेवी

उपन्यास की समीक्षा

सभ्य समाज में दहेज की कुरीति और नारी की भावनाओं का ह्रदयस्पर्शी चित्रण सेवासदन में मिलता है।

सुमन और शांता, दरोगा कृष्णचंद की दो बेटियॉं हैं।

कृष्णचंद एक इमानदार और कर्तव्यपरायण व्यक्ति हैं, जो रिश्वत और नज़राना लेने को पाप समझता है, किंतु बेटी की शादी के लिए उसे यह पाप कर्म करना पड़ता है।

इस कार्य में अभ्यस्त न होने के कारण वह फँस जाता है और सजावार हो जाता है।

सुमन अपनी उम्र से बड़े दुहाजु व्यक्ति से ब्याह दी जाती हैं जो उसकी भावनाओं की कद्र नहीं करता है।

एक दिन क्रोध में आकर सुमन को घर से निकाल देता है और मजबूरन सुमन को कोठे पर बैठने को विवश होना पड़ता है।

सेवासदन उपन्यास का सार

उपन्यास कुछ इस तरह शुरु होता हैं , कृष्णचंद दरोगा के पद पर आसीन एक रसिक, उदार, सज्जन और इमानदार व्यक्ति थे।

25 वर्ष थानेदारी करते हुए भी उन्होंने इतना धनार्जन नहीं किया कि बेटी की शादी के खर्चों की चिंता न करनी पड़े।

वह शिक्षित परिवारों में रिश्तें लेकर जाते कि वहॉं दहेज पर बात नहीं होगी।

राशि, वर्ण ठीक हो जाने पर लेन-देन की बातें होने लगती थी जहाँ वरों का मोल उनकी शिक्षा के अनुसार है।

सभी के पास दहेज के पक्ष में दलीलें एैसी थी कि दरोगा जी निरुत्तर हो जाते थे।

एक सज्जन ने कहा, महाशय , मैं स्वयं इस कुप्रथा का जानी दुश्मन हुँ, लेकिन करुँ क्या, अभी पिछले साल लड़की का विवाह किया, दो हज़ार रुपए केवल दहेज में देने पड़े, दो हज़ार खाने-पीने में खर्च करने पड़े, आप ही कहिए, यह कमी कैसे पूरी हो ?

दूसरे महाशय इनसे अधिक नीतिकुशल थै। बोले –

दरोगा जी, मैंने लड़के को पाला है, सहस्त्रों रुपए उसकी पढ़ाई में खर्च किए हैं। आपकी लड़की को इससे उतना ही लाभ होगा जितना मेरे लड़के को। तो आप ही न्याय कीजिए कि यह समस्त भार मैं अकेला कैसे उठा सकता हुँ ?

इन सभी कथनों को सुन-सुन कर दरोगा जी को अपनी इमानदारी पर पश्चाताप होता है।

हर जगहों से थक हार जाने के पश्चात उन्हे रिश्वत लेना ही एक अंतिम युक्ति सूझती है।

अपनी आत्मा को कुचल कर दरोगा जी तीन हज़ार रुपए रिश्वत लेते हैं

उसमें से मुख्तार का हिस्सा देने से इंकार कर देते हैं।

मुख्तार उनके रिश्वत का भांडाफोड़ कर देता है।

तिलक के एक दिन पहले सुपरिटेन्डेट पुलिस वारंट लिए उनके घर आता है और वह अपना अपराध स्वीकार कर लेते है।

उनके अनुसार इस अपराध की सजा काटने से यह धन गलत नहीं कहलाएगा।

उन्हें पॉंच वर्ष की सजा होती है जो कि घट कर चार वर्ष हो जाती है।

यह सब सुनकर गंगाजली के भाई उमानाथ अपनी बहन और भॉंजियों को अपने घर ले जाते है।

उमानाथ सुमन का विवाह शहर के एक तीस वर्षीय दुआह व्यक्ति से तय कर देते है।

जो कि एक कारखाने में नौकर है और पंद्रह रुपए महीना प्राप्त करता है।

सुमन एक पढ़ी-लिखी रूपवती स्त्री थी जिसने सदैव अपने पिता के साथ आराम का जीवन व्यतीत किया था।

गजाधर के घर जब वह विवाह कर के गई तब उसके घर की स्थिति देखकर चिंतित हुई।

जबतक गजाधर की फुआ जीवित थी घर का समस्त कार्य वह कर दिया करती थी।

उनके मरणोपरांत सुमन को स्वयं सारा घर का कार्य करना पड़ता था।

धीरे-धीरे सुमन इस स्थिति के साथ अभ्यस्त हो गई।

उसके घर के सामने भोली नाम की वैश्या रहती थी।

सुमन उसके रहन-सहन को देखकर उसके जैसी सुविधाओं की अकांक्षा करती थी।

उस वैश्या के यहॉं शहर के बड़े-से-बड़े रईस आते-जाते थे।

इसी बीच सुमन की दोस्ती पंडित पदमसिंह की पत्नी सुभद्रा से हो जाती है।

वह रोज घर का काम समाप्त कर उनके पास जाती थी।

पदमसिंह के म्युनिसिपैलिटी के मेम्बर बनने की खुशी में मित्रों के जोर देने पर मुजरे का कार्यक्रम रखा जाता है।

पंडित जी के घर भोली बाई का कार्यक्रम होता है और सुमन को घर आने में देरी हो जाती है।

गजाधर इस बात से गुस्सा होकर उसे घर से निकाल देता है।

वह रोती हुई सुभद्रा के घर चली जाती है।

गजाधर को यह जानकर गुस्सा आता है और वह विट्ठलदास के साथ मिलकर पदमसिंह और सुमन के बीच गलत अफवाह फैला देता है।

जिस कारण सुमन को उनके घर से भी जाना पड़ता है।

सुमन न चाहते हुए भी भोली बाई के पास जाती है।

भोली बाई उसे कोठे की चकाचौंध में अंधी बनाकर गलत मार्ग प्रशस्त करती है।

सेवासदन में यह भी दिखाया गया है कि लोग कोठे को हीन भाव से तो देखते ही हैं किंतु वहाँ हर किसी का आना जाना लगा रहता हैं

आज यहाँ कौन रईस, कौन महाजन, कौन मौलवी, कौन पंडित ऐसा है जो मेरे तलुवे सहलाने में अपनी इज्जत न समझे ?

भोली बाई सुमन से कहती है।

जिससे सुमन से एक सुमन बाई बन जाती है।

यह जानकर पंडित पदमसिंह अपने मित्र विट्ठलदास को पत्र लिखते है।

गलत अफवाहों के कारण सुमन से सुमन बाई बन गई है।

विट्ठलदास दाल मंडी से वैश्याओं को हटाना चाहते थे ।

जो व्यक्ति इन में लिप्त होते थे उनसे घृणा करते थे।

पदमसिंह का भतीजा सदन सिंह सुमन पर मुग्ध हुआ रहता है।

सुमन भी जिस प्रेम की अकांक्षा करती है वह सदन में पाती है।

सुमन को भी सदन का उसके पास आना पसंद आने लगता है।

इस रिश्ते का कोई भविष्य नहीं है यह अंजाम से अवगत होने के बाद भी।

सदन एक दिन अपनी चाची (सुभद्रा) का कंगन चुराकर सुमन को देता है।

उस कंगन को पहचान जाने के बाद सुमन, सदन के बारे में पता करवाती है कि यह कौन है? 

विट्ठलदास सुमन के पास वैश्या जीवन त्यागने का प्रस्ताव लेकर आते है।

विट्ठलदास से यह सह्य नहीं होता है कि उनकी जाति की पूज्य ब्राह्मण महिलाएं ऐसे कलंकित मार्ग पर चलने लगी तो उनकी अधः पतन का अब पारावार नहीं है।

अगर तुम्हें यह आशा है कि यहाँ सुख से जीवन कटेगा तो तुम्हारी बड़ी भूल है। यदि अभी नहीं तो थोड़े दिनों में तुम्हें अवश्य मालूम हो जाएगा कि यहाँ सुख नहीं है। सुख संतोष से प्राप्त होता है, विलास से सुख कभी नहीं मिल सकता।

विट्ठलदास ने सुमन से कहा।

सुमन ने आज तक किसी से ऐसी बातें न सुनी थी। वह इन्द्रियों के सुख को, अपने आदर को जीवन का मुख्य उद्देश्य समझती थी।

उसे आज मालूम हुआ कि सुख संतोष से प्राप्त होता है और आदर सेवा से।

सुमन उनके समक्ष कुछ शर्त रखती हैं कि उसे रहने को छत, पचास रुपए महीने ख़र्च और पदमसिंह से एक बार बात करने की इच्छा जाहिर करती है।

विट्ठलदास ने विधवा आश्रम में सुमन के रहने का प्रबंध कर देते है। उसकी पहचान उजागर किए बिना।

पदमसिंह ने पश्चाताप में सुमन को पचास रुपए महीने देने को राजी हो जाते हैं कि यदि उन्होंने सुमन को अपने घर से न निकाला होता तो उसे दाल मंडी में नहीं बैठना पड़ता।

सदन का विवाह सुमन की बहन शांता से ठीक हो जाता है।

बारात घर आती है तभी शांता सुमन की बहन है इस बात का भांडाफोड़ हो जाने से बारात लौट जाती है।

शांता ने मन-ही-मन सदन को पति स्वीकार कर लेती है।

शांता का दूसरी जगह रिश्ता तय होने की बात सुनकर वह पदमसिंह को पत्र लिखती है कि मुझे यहॉं से ले चलिए मुझे किसी अन्य व्यक्ति से विवाह नहीं करना अन्यथा मैं प्राण त्याग दूँगी।

पदमसिंह ने उसे भी सुमन के साथ विधवाआश्रम में रखवा देते हैं कि वह अपने भाई मदनसिंह को मनाकर उसे उसके ससुराल भिजवा देगें।

सदन को ज्ञात होता है कि सुमन विधवा आश्रम में रहती है।

वह उससे मिलने की कोशिश करता है।

सुमन उससे अपनी बहन को अपनाने की आग्रह करती है।

सदन उसे अपने घर भी नहीं ले जा सकता था कि पिता जी राजी नहीं होगें और चाचा की वह बदनामी नहीं करवाना चाहता था।

सदन ने अपने हार को बेचकर नाव खरीदता हैं और नाव के व्यापार में लगा रहता है कि अपने बूते शांता को रखूगॉं।

धीरे-धीरे सदन ने एक झोपड़ी नदी के पास बना ली।

किसी ने विधवाआश्रम में सुमन का परिचय जाहिर कर दिया जिसके कारण कई औरतें आश्रम छोड़कर चली गई।

सुमन को यह सह्य नहीं हुआ वह और शांता आश्रम छोड़कर जा रही होती है।

 तभी सदन ने उन्हें रोका सारी बातें जानकर सदन ने कहा मैंने यह झोपड़ी इसी लिए बनाई है।

चाचा से आज्ञा लिए बिना शांता को लाते नहीं बनता था। तब से दोनों वहीं रहने लगी।

सदन ने चाचा से सारी बातें बताई उन्हें प्रसन्नता हुई किंतु मदन सिंह के ख्याल से भय हुआ।

सुमन अब तक एक साध्वी बन चुकी थी जैसे अपने पापों का पश्चाताप कर रही हो।

पंडित पदम सिंह वैश्याओं के लिए रहने का एक अलग आश्रम बनवाने में जुटे थे।

जहॉं वह सभी वैश्यावृति को छोड़कर चैन की जिन्दगी व्यतीत कर सके।

शांता को सुमन का भी साथ रहना धीरे-धीरे अखड़ने लगा।

उसे सदैव लगता रहता था कि सुमन कहीं उसके पति (सदन) को अपनी ओर आकर्षित न कर ले।

सदन को पुत्र होने पर उसके माता-पिता और चाचा-चाची आते है उसी दिन सुमन वह घर त्याग देती है।

तब उसकी मुलाकात उसके पति गजाधर जो कि एक साधु बनकर गजानंद बन जाता है उससे अपने कर्मों की दोनों एक दूसरे से माफ़ी मॉंगते है।

गजानंद सुमन को पदमसिंह द्वारा निर्मित कन्याओं के अनाथ आश्रम में उनकी देख-भाल करने को रहने का प्रस्ताव देता है।

जिसे सुमन खुशी से अपना लेती है और अपना सौभाग्य समझती है कि इसी बहाने वह अपने पापों का प्रायश्चित कर सकेगी।

इस अनाथ आश्रम में वैश्याओं द्वारा दी गई कन्याओं को रखा जाता था इसका नाम सेवासदन था।

इसका ख़र्च म्युनिसिपैलिटी से वहन होता था।

सुमन के कार्यकुशलता के कारण यह अनाथ आश्रम बेहद चर्चा में रहने लगा।

इस अनाथ आश्रम में पॉंच कमरे थे।

यहॉं इन कन्याओं को जीवन को सुलभ बनाने के सभी कार्य सिखाए जाते थे। सिलाई, बुनाई, चित्रकारी, इत्यादि।

पंडित पदम सिंह वकालत छोड़ देते है और मुनिसिपैलिटी के प्रधान के रूप में शहर के उथान लिए कार्य करने लगते है।

सदन के अब पाँच नाव चलते है और वह एक स्टीमर मोल लेने की सोच रहा है।

संदर्भ ग्रंथ

सेवासदन – प्रेमचंद

हिंदी साहित्य का सरल इतिहास – विश्वनाथ त्रिपाठी

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