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अपना-अपना भाग्य कहानी – जैनेन्द्र कुमार की समीक्षा और पात्र परिचय

अपना-अपना भाग्य कहानी में देश में सर्वथा व्याप्त ऐसी दारुन स्थिति को दर्शाया गया है।

कहानी में सामाजिक विषमता गरीब और अमीर के बीच की बड़ी सी खाई को दिखलाया गया है।

जो सभी को इस परिस्थिति पर सोचने को विवश कर देती है।

मनुष्य में मानवीयता से बढ़कर स्वार्थ है और ऐसा मनुष्यों को कहते हुए भी शर्म नहीं आती।

किसी जरूरतमंद की यदि सहायता की जा सकती है तो उसे बेझिझक करनी चाहिए क्या पता वह दिन उसका आख़री दिन होने से आप उसे बचा सकते है।

कहानी के पात्र

लेखक – एक बुद्धिजीवी व्यक्ति जो सहृदय है। लोगों के प्रति दया भाव रखने वाला व्यक्ति।

लेखक का मित्र – यह भी लेखक के समान है।

बालक – 10 वर्षीय बालक जो कि बेघर, काम के तलाश में और भूखा है।

इसी बालक के जीवन की त्रासदी को यह कहानी बयाँ करता है।

अपना-अपना भाग्य कहानी की समीक्षा

अपना-अपना भाग्य कहानी की शुरुआत नैनीताल के वादियों में होती है।

कहानी के शुरुआत में नैनीताल के मनोरम दृश्यों का वर्णन मिलता है।

चारों तरफ़ शांति एक पहाड़ी स्थान होने के नाते पर्यटकों के जमावड़े का दृश्य भी दर्शाया जाता है।

यहाँ भारतीय और विदेशी स्त्रियों में एक अंतर भी दर्शाया गया हैं जो इस प्रकार है –

“उधर हमारी भारत की कुललक्ष्मी, सड़क के बिल्कुल किनारे दामन बचाती और संभालती हुई, साड़ी की कई तहों में सिमट-सिमट कर, लोक-लाज, स्त्रीत्व और भारतीय गरिमा के आदर्श को अपने परिवेष्टनों में छिपाकर सहमी-सहमी धरती में आँख गाड़े, कदम-कदम बढ़ रही थी।

भारतीय और विदेशी स्त्रियों में ये द्वंद्व विचारणीय है जहाँ हमारे देश की स्त्रियाँ अपने निवास स्थान पर भी सहमी-सहमी चल रही कुछ असर हमारी संस्कृति का है और कुछ पुरुष प्रधान सोच का।

“अंग्रेज रमणियाँ थीं, जो धीरे-धीरे नहीं चलती थी, तेज़ चलती थी।

उन्हें न चलने में थकावट आती थी, न हंसने में मौत आती थी।

कसरत के नाम पर घोड़े पर भी बैठ सकती थी और घोड़े के साथ-ही-साथ, जरा जी होते ही किसी हिंदुस्तानी पर कोड़े भी फटकार सकती थी।

वे दो-दो, तीन-तीन, चार-चार की टोलियों में, निःशंक, निरापद इस प्रवाह में मानो अपने स्थान को जानती हुई सड़क पर चली जा रही थी।”

जो कि विदेशी स्त्रियों में ऐसी असमानता नहीं दिखाई देती हैं।

लेखक और उसका मित्र दोनों इन वादियों का लुफ़्त उठा रहे थे।

वही बैठे-बैठे शाम हो गयी और सर्दी भी बढ़ गयी थी।

धीरे-धीरे अंधकार बढ़ गया और कुहासा चारों ओर बढ़ गया।

उसी अंधकार में एक लड़का सामने आया।

जो कल से भूखा और रहने का कोई ठिकाना भी नहीं था पर वो काम चाहता था।

वह लड़का अपना घर छोड़ कर भाग आया था।

वहाँ खाने को कुछ नहीं था उसका बाप उसे मारता था और उसके कई भाई बहन थे।

उसके साथ एक साथी भी आया था जो कि उसके साहब ने मारा तो मर गया था।

तभी लेखक और उसके दोस्त उसे वकील साहब के पास लेकर गए उन्हें एक नौकर की जरूरत थी।

पर वह उसे रखने से मना कर देते है कि ऐसे किसी अनजान को वो घर में नहीं रख सकते थे।

सर्दी बहुत तेज़ थी और उस लड़के के बदन पर मुश्किल से कुछ ही कपड़े थे नंगे पैर और नंगा सिर।

उन दोनों ने उसकी मदद इस लिए नहीं कि के अभी उनके पास केवल नोट है खुदरे पैसे नहीं।

उस लड़के को कल आने को कहा उस ठंड में उनके गर्म कोट में भी उन्हें ठंड लग रही थी।

उस लड़के से पूछा कि कहाँ सोएगा ?

तो उसने ज़वाब दिया यहीं कहीं पेड़ के नीचे।

उस नंगे पैर बिना गर्म कपड़ों के फिर भी उस लड़के की न सोच उन दोनों ने अपनी सोची।

उसे वही बाहर छोड़ दिया खुद बिस्तर में गर्म होने को लपक पड़े।

लेखक ने कहा पहले अपने बिस्तर में गर्म हो लो फिर किसी की चिंता करना।

अगले दिन समाचार मिला कि वही दस वर्षीय पहाड़ी बालक सड़क के किनारे पेड़ के नीचे ठिठुर कर मर गया।

इस ख़बर को सुनकर सब ने कहा और सोचा अपना-अपना भाग्य।

अपना-अपना भाग्य कहानी देश में व्याप्त गरीबी को यथावत दिखाने में सफल हुआ है।

हम कभी-न-कभी ऐसे व्यक्ति से सामना जरूर ही करते है जिन्हें मदद की बेहद जरूरत होती है।

यह कहानी हमें दूसरों की मदद करने का भी पाठ सिखाती है।

मनुष्य को अपनी मनुष्यता नहीं त्यागनी चाहिए यही तो एक अंतर है जो हमें जानवरों से अलग बनाता है।

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