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मैला आँचल उपन्यास – फणीश्वरनाथ रेणु की समीक्षा और पात्र परिचय

मैला आँचल उपन्यास की शुरुआत 1946 में बिहार के एक पिछड़े गाँव मेरीगंज में मिलेट्री के आने से होता है।

रेणु जी ने बहुजनों की आर्थिक और सामाजिक समस्या को बेहद गहराई से समझकर उसके हर पक्षों को उजागर किया है।

1946 में उपन्यास के घटनाक्रम को आरंभ करते समय रेणु ने 1942 के जन आंदोलन के प्रभाव और पृष्ठभूमि को भी साथ ही चित्रित करते है।

गाँव की सामान्य रूपरेखा, उसका इतिहास और विकास आगे चलकर बताते हैं।

गाँव की सामाजिक पृष्ठभूमि, उसका जातिगत विभाजन, उसका मानसिक पिछड़ापन वे प्रथम अध्याय में ही बता देते है।

समीक्षा

मैला आँचल उपन्यास के लिए फणीश्वरनाथ रेणु को पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।

यह हिंदी का प्रतिनिधि आँचलिक उपन्यास है ।

इसके कथ्य में आँचलिकता की सारी विशेषता मिलती है जो उपन्यास को आँचलिक होने का दर्जा दे सके।

मैला आँचल में बिहार के पूर्णिया जिले के मेरीगंज गाँव की कथा है।

इस उपन्यास का उद्देश्य अंचल की समस्याओं को सबके सामने लाने का रहा है।

इसमें अँचल की सुंदरता व कुरूपता दोनों का चित्रण मिलता है।

जिसमें जातिवाद, अफसरशाही, अवसरवादी राजनीति, मठों और आश्रमों का पाखंड भी दर्शाया गया है।

वस्तु और शिल्प दोनों ही आधारों पर यह उपन्यास सबसे अलग है।

इसमें एक नए शिल्प में ग्रामीण-जीवन को दिखाया गया है।

इसकी सबसे बड़ी विशेषता है कि इस उपन्यास का नायक कोई नहीं है, बल्कि पूरा अंचल ही इसका नायक है।

मिथिलांचल प्रदेश के ऊपर रचित कथा में अँचल की भाषा का अधिक उपयोग है।

जो कि वहाँ के पर्व-त्यौहार, रीति-रिवाज और सोच-विचार को ज्यो-का-त्यों दर्शाया गया है।

लेखक परिचय

आँचलिक उपन्यास की ओर लेखकों का रुझान फणीश्वरनाथ रेणु जी की कृपा के कारण है।

जिन्होंने आँचलिक उपन्यास लेखन की शुरूआत की मैला आँचल के माध्यम से।

इन्होंने आँचलिक जीवन की हर कोने का जिक्र अपने उपन्यास में किया।

पाठकों को बांध कर रखने की उनमें एक चमत्कारी कला है।

इनकों जितनी प्रसिद्धि मैला आँचल के कारण मिली उतनी और किसी कृति से नहीं प्राप्त हुई।

पात्र परिचय

डॉ. प्रशांत – एक युवा डॉक्टर है, जो अपनी शिक्षा हाल में पूर्ण करके इस गांव को कार्यभूमि के रूप में चुना है।

एक मुख्य पात्र है।

कमली – मुख्य नारी पात्र है। जो कि एक अज्ञात बीमारी से ग्रस्त है।

विश्वनाथ मालिक – कमली की पिता हैं, जो कि एक जमींदार है।

मैला आँचल उपन्यास का सार

उपन्यास का मुख्य पात्र डॉ. प्रशांत बनर्जी है जो पटना के मेडिकल कॉलेज से शिक्षा प्राप्त कर मलेरिया और कला-अजर पर शोध करने मेरीगंज आते है।

मलेरिया केंद्र खुलने से सम्पूर्ण गाँव में हलचल मच जाती है।

लोगों में अंधविश्वास को लेकर बड़ी आस्था दिखाया गया है जिसमें झार-फूंक, टोना-टोटका, भूत-प्रेत आदि पर विश्वास दिखाई देता है।

जाति व्यवस्था का भी बोल-बाला दिखता है।

डॉ. प्रशांत कमली से प्रेम होता है और साथ-ही-साथ लोगों की स्तिथि से रूबरू होकर उनमें राजनीतिक चेतना जागृत करता है।

कमली एक कोमल हृदय वाली स्त्री है। जो अपने अभिभावकों को किसी भी कष्ठ में नहीं डालना चाहती है।

कमली के पिता विश्वनाथ मालिक गाँव के तहसीलदार है और बाद में इसे छोड़ कांग्रेस में शामिल हो जाते है।

ये जमींदारी प्रथा के प्रतीक है।

विश्वनाथ मलिक के चरित्र में द्वंद दिखाया गया है।

नेता होने पर गंभीर होते है वहीं घर पर एक हँसोड़ और समझदार व्यक्ति बन जाते है।

मैला आँचल में सम्पूर्ण समाज जति व्यवस्था में जकड़ा हुआ है और जातिगत झगड़े आम बात है।

जातिगत शक्ति संतुलन भी सामाजिक संरचना ही करता है।

प्रत्येक जाति का अलग टोला है।

दलितों के टोले में सवर्ण तभी प्रवेश करते है जब उनका कोई स्वार्थ हो।

छुआछूत का वातावरण है, भंडारे में सब जाति के अनुसार बैठ के खाते है ।

लेखक ने आर्थिक समस्या को मेरीगंज की सबसे बड़ी समस्या माना है।

यह भी कहा है कि जबतक गरीबी व जहालत समाप्त नहीं होगी, तब तक ये अंचल मैला ही रहेगा।

लेखक ने डॉ. प्रशांत का चरित्र में यह दर्शाया है कि वह पैसे कमाने नहीं बल्कि बीमारी का इलाज खोजने आया है।

आकर्षक प्रस्ताव को ठुकरा कर उसने जानकर यह गाँव चुना है ।

किन्तु बाद में गाँव की स्तिथि से वाकिफ़ होकर सोचने लगा कि जिनके लिए जीवन का अर्थ भूख और बेबसी है, उसके लिए दवाई किसी काम की नहीं है।

उसके लिए बेहतर यही है कि वह भूख और बेबसी के स्थान पर मलेरिया से बेहोश होकर शांतिपूर्ण मृत्यु प्राप्त कर सके।

शिल्पगत विशेषता

कथानक में कई कथाएं है।

चरित्र प्रायः स्वाभाविक है।

चरित्र परिवर्तनशील है।

भाषा सृजनात्मक और प्रयोगशील है।

लेखक ने सरल और सजीव भाषा में प्रचलित लोककथा, लोकगीत, लोकसंगीत के साथ तत्कालीन सामाजिक- राजनीतिक परिवेश को इस उपन्यास के माध्यम से प्रस्तुत करते है।

इससे पता चलता है कि आँचलिक जीवन स्थिर नहीं होता। उसमें निरंतरता और प्रवाह होता है।

सूक्ष्म व्यंगात्मक शैली में उपन्यास की रचना की गई है।

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