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जैन और जैनेत्तर काव्य का संक्षिप्त ज्ञान

इतिहास

जैन और जैनेत्तर काव्य का उद्भव एवं विकास को हम संक्षिप्त में जानेगें ।

इस पुरे कालखंड में मिलने वाली जैन और जैनेत्तर रचनाओं में जैन काव्य ही ऐसे हैं जो प्रमाणिक हैं

जैन कवियों को राजाश्रय भी मिला था और व्यापारियों का आश्रय भी ।

जैन लोगों की धार्मिक आस्था अद्वितीय है

पर जैन काव्य मध्यदेश के पश्चिमोत्तर में ही मिलते हैं ।

वह इलाका जैन धर्मावलम्बियों का गढ़ था ।

समुद्री व्यापार ही उन्ही के हाथ में था ।

उनकी यात्राओं के फलस्वरूप जैन काव्यों का प्रचार-प्रसार हुआ होगा ।

उनकी अपनी धार्मिक आस्था के कारण जैन भांडागारों में जैन-काव्य सुरक्षित रह सके ।

रामचंद्र शुक्ल के समय तक जैन अपभ्रंश काव्यों में से बहुत कम प्रकाश में आए थे ।

अतः उन्होंने अपने इतिहास में कुछ ही कवियों का उल्लेख किया है ।

पर आश्चर्य है कि उन्होंने न तो उनकी साहित्यिकता के सम्बन्ध में कुछ कहा और न भाषा पर ही टिपण्णी की ।

हेमचन्द्र के व्याकरण में उध्दत दोहों के काव्य-सौन्दर्य के सम्बन्ध में उनके जैसे रसवादी आचार्य का चुप रहना अखरता है ।

संभव है, जैन काव्य होने के कारण उन्होंने बौद्धसिद्धों कि रचनाओं की तरह इन्हें भी कोरा सांप्रदायिक ग्रन्थ मान लिया हो ।

इधर पिशेल, याकोबी, दलाल, हीरालाल जैन, मुनि जिनविजय आदि ने जैन भंडागार से सैकड़ो पुस्तकें खोज निकली हैं

उन्हें देखने से पता चलता है कि इन धार्मिक काव्यों में साहित्य उसी प्रकार लिपटा हुआ है जैसे बादलों में बिजली ।

बिजली के इस प्रकाश की ओर विद्वानों का ध्यान गया है ।

साहित्य के इतिहास के लिए इसी की उपादेयता है।

जैनकाव्य मूलतः धार्मिक हैं, पर उनमें काव्य तत्व भी है

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हेमचन्द्र जैन थे

किन्तु उनके व्याकरण में संग्रहीत ऐसे बहुत-से दोहे हैं जो शुद्ध काव्य की कूटी में आते हैं ।

वे अवश्य जैनेत्तर कवियों द्वारा लिखे गये होंगे ।

“प्राकृत पैन्गलम” में संग्रहीत छंदों के बारे में भी यही सच है । जहां तक जैन सिद्धांतो का प्रश्न है –

हज़ारीप्रसाद द्विवेदी ने ठीक ही कहा है –

“अगर उनकी (जैनों की) रचनाओं के ऊपर से ‘जैन’ विशेषण हटा दिया जाय तो वे योगियों और तांत्रिको की रचनाओं से बहुत भिन्न नहीं लगेगी ।”

जैन काव्य के प्रकार

जैन काव्य को काव्य-रूप की दृष्टि से कई भागों में बांटा जा सकता है ।

जैसे – पुराण काव्य, चरित काव्य, कथा काव्य, रास काव्य ।

रहस्य काव्य तथा अजैन काव्यों को श्रृंगार और वीर – दर्प्पपूर्ण काव्य , गेय काव्य तथा कहानी में ।

इनके अलावा इस काव्य में गढ़ की कुछ पुस्तकें भी मिलती हैं ।

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